सृजन और प्रलय का आधार – जागृत चेतना!

YUVA SHAKTI BANARAS/ January 8, 2016/ Science & Spirituality/

 

Angry-Lord-Shiva-Tandavसन् 1945 की एक शाम- शानदार दावत का आयोजन किया गया। इसमें उपस्थित थे, विश्व के प्रसिद्ध (भौतिक वैज्ञानिक और मैनहैटन प्रोजेक्ट (Manhattan Project) के प्रमुख रोबर्ट ओपनहिमर (Robert Oppenheimer) जानते हैं, यह विशाल दावत किस उपलक्ष्य में थी? अलामोगोरडो नामक एक स्थान में पहले परमाणु बम के सफल परीक्षण पर और हिरोशिमा-नागासाकी में विनाश का तांडव करने पर। परन्तु आश्चर्य का विषय यह है कि विज्ञान की इस महत्त्वपूर्ण महान उपलब्धि के बाद भी यह दावत असफल रही। रोबर्ट ने पाया कि इस बम-विस्फोट से लोग असहमत थे। एक वैज्ञानिक तो इतना बेचैन और दुःखी था कि उल्टी करने उसे दावत से बाहर जाना पड़ा।

इस घटना से हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि इतनी बड़ी वैज्ञानिक सफलता के पश्चात् वैज्ञानिक ही प्रसन्न नहीं थे। कारण- इस वैज्ञानिक खोज के पीछे जागृत चेतन-शक्ति का अभाव था अर्थात् प्रयोगात्मक अध्यात्म लुप्त था। आइए, इसी से सम्बन्ध्ति रोबर्ट के जीवन के कुछ पूर्व पलों पर दृष्टिपात करते हैं। दिनांक 16 जुलाई… अलामोगोरडो के मरुस्थलीय क्षेत्रा में पहले परमाणु बम का परीक्षण किया गया। उस प्रयोग के पश्चात् सारे आकाश में भीषण अग्नि के बादल छा गए। यह दृश्य देखकर दूर खड़े रोबर्ट के मस्तिष्क में अकस्मात् ही कुछ पंक्तियाँ कौंधी- I am the DEATH, the destroyer of worlds. ये पंक्तियाँ थीं, श्रीमद्भागवत गीता के ग्यारहवें अध्याय में से- ‘कालोस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धोलोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।’ अर्थात् श्री कृष्ण कहते हैं- मैं लोकों का नाश करने वाला, बढ़ा हुआ महाकाल हूँ। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ।

इससे स्पष्ट होता है कि रोबर्ट की अंतरात्मा ने उसे कहीं न कहीं झकझोरा और यह झकझोर अध्यात्म की वेदांत-ध्वनि लिए हुए थी। इसलिए ए.डी.रिइनकोर्ट भी अपनी पुस्तक ‘The eye of Shiva’ में कहते हैं कि ‘It can be a moment of great significance when Western science will converge with Eastern Vedanta.’ अर्थात् वह एक महत्त्वपूर्ण व महान घटना होगी, जब पश्चिमी विज्ञान पूर्व के वेद-शास्त्रों की ओर रुख कर लेगा।

निःसन्देह, यह कथन बहुत मार्मिक है। क्योंकि इस समन्वय से भौतिक विज्ञान द्वारा हिंसक दुर्घटनाएँ नहीं घटेंगी। इसी मर्म को जानते व समझते हुए बहुत से पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने पश्चिमी विज्ञान और भारत के अध्यात्म के बीच विलक्षण तारतम्यता ढूँढ़ने की कोशिश की। प्रसिद्ध (भौतिक विज्ञानी- प्रोफेसर फ्रिटष्ठोफ कैपरा ने भी अपने लेखों के माध्यम से इस अनूठे सामंजस्य को प्रकट करने की चेष्टा की। इन लेखों में से एक में प्रो. कैपरा ने भौतिक विज्ञान के फेयनमैन्स डायग्राम (Feynmann’s diagram) और भगवान शिव के दिव्य नृत्य के बीच समानता दिखलाई है।

इस विषय को गहराई से समझने के लिए आइए पहले फेयनमैन्स डायग्राम को समझते हैं। सन् 1948 में, भौतिक वैज्ञानिक रिचर्ड पफेयनमैन ने प्रथम बार फेयनमैन्स डायग्राम को समाज के समक्ष प्रस्तुत किया। यह डायग्राम उप-परमाण्विक (sub-atomic) कणों के व्यवहार का चित्राण करता है। विज्ञान की भाषा में, Feynmann’s diagram show that every sub-atomic interaction consists of the annihilation of the original particles and the creation of new sub-atomic particles अर्थात् उप-परमाण्विक कणों में कुछ पारस्परिक क्रियाओं के परिणामस्वरूप मौलिक कण समाप्त हो जाते हैं और उनका स्थान नए उप-परमाण्विक कण ले लेते हैं। उदाहरण के लिए, चित्रा (क) में दिखाए गए फेयनमैन्स डायग्राम को देखें। इस डायग्राम में दो उप-परमाण्विक कणों- एक इलैक्ट्रॉन (e-) और एक प्रोटॉन (e+) का अस्तित्व समाप्त होता है और उनका स्थान वर्चुअल फोटोन (r) ले लेता है। उसके बाद इस वर्चुअल फोटोन (r) में से दो नए उप-परमाण्विक कणों क्वार्क और एंटी-क्वार्क का निर्माण होता है। इस प्रकार उप-परमाण्विक कणों के विनाश और निर्माण की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है, जिसे हम ऊर्जा-नृत्य (energy dance) भी कह सकते हैं।

प्रो. कैपरा अपने लेख ‘The dance of Shiva: The Hindu view of Matter in the light of Modern Physics’ में  इस ऊर्जा-नृत्य की तुलना भगवान शिव के नृत्य से करते हैं। वे कहते हैं- ‘Every sub-atomic particle not only performs an Energy dance, but also is an energy dance: a pulsating process of creation and destruction… without end… For the modern Physicists, the Shiva’s dance is the dance of sub-atomic matter.  As in the Hindu mythology, it is a continual dance of creation and destruction involving the whole cosmos; the basis of all existence and of all natural phenomena.’

भावार्थ- हर उप-परमाण्विक कण केवल ऊर्जा नृत्य नहीं कर रहा है, अपितु वह स्वयं में भी ऊर्जा नृत्य है। एक ऐसी प्रलय और निर्माण की प्रक्रिया, जो निरन्तर गतिमान है! भौतिक वैज्ञानिकों के लिए भगवान शिव का नृत्य ऐसे ही उप-परमाण्विक कणों का नृत्य है। हिन्दू मत के अनुसार यह सृष्टि के प्रलय और सृजन की प्रक्रिया का निरन्तर गतिमान रहने वाला नृत्य है, जो कि सम्पूर्ण जगत का आधार है।

भगवान शिव के अनेकों नामों में से एक नाम- नटराज है। नटराज अर्थात् नृत्य के देवता। भगवान शिव का यह दिव्य नृत्यरूप ही सृष्टि के प्रलय और सृजन का आधर है। शिवजी के नृत्य के दो प्रकार हैं- (1) सौम्य नृत्य, जिसका सम्बन्ध सृष्टि के सृजन से है, (2) तांडव अर्थात् विनाशकारी नृत्य, जो प्रलय से सम्बन्ध्ति है। कहने का भाव कि सौम्य और तांडव नृत्य भगवान शिव की प्रकृति के दो पक्ष हैं, जिसके द्वारा वे सृष्टि का लय और सृजन करते हैं।

इसके अतिरिक्त भगवान शंकर का बाह्य रूप भी सांकेतिक है। भगवान शिव को उमा (अर्थात् पृथ्वी) और समस्त प्रजातियों का रक्षक कहकर भी संबोध्ति किया जाता है। वे अपने चार हाथों से सम्पूर्ण चराचर जगत की रक्षा कर रहे हैं। शिव जी का ऊपरी दायां और बायां हाथ फेयनमैन्स डायग्राम में घटित प्रक्रिया को दर्शाता है। उनके ऊपरी दाएं हाथ में डमरू विराजमान है- जो सृजनात्मक ध्वनि का सूचक है। वह नाद, जिसके द्वारा सृष्टि का सृजन होता है। ऊपरी बाएं हाथ में उन्होंने अग्नि की ज्वालाओं को धरण किया हुआ है- जो प्रलय का प्रतीक है। ठीक यही प्रक्रिया तो फेयनमैन्स डायग्राम में घटित होती है। दो उप-परमाण्विक कणों- इलैक्ट्रॉन (e-) और प्रोटॉन (e+) का लय हुआ। और नए कणों क्वार्क और एंटी-क्वार्क का निर्माण हुआ।

परन्तु यहाँ पर विचारणीय तथ्य यह है कि दो उप-परमाण्विक कणों के लय और नवीन उप-परमाण्विक कणों के निर्माण के मध्य वर्चुअल फोटॉन (r) होता है। इसी प्रकार भगवान शिव के ऊपरी दाएँ हाथ (जो सृजन का सूचक है) और ऊपरी बाएँ हाथ (जो प्रलय का सूचक है) के बीच उनका जागृत चेतन-स्वरूप है। वर्चुअल फोटॉन- जो निराकार प्रकाश का द्योतक है, इसी जागृत चेतना (awakened consciousness) की ओर संकेत कर रहा है।

इन समस्त तथ्यों से यह भी स्पष्ट होता है कि विज्ञान को अध्यात्म द्वारा ही पूर्णरूपेण समझा जा सकता है। विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय पर प्रकाश डालते हुए भौतिक विज्ञानी प्रो. कैपरा कहते हैं- Scientists will not need to be reluctant to adopt a holistic framework as they are often today, for fear of being unscientific.  Modern Physics will have shown them that such a framework would be not only scientific; it would be consistent with the most advanced scientific theories of physical reality. अर्थात् वैज्ञानिकों को इस भय से कि उनकी सोच वैज्ञानिक नहीं रहेगी, धार्मिक या आध्यात्मिक रूपरेखा को अपनाने से परहेज करने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि भौतिक विज्ञान स्वयं स्पष्ट कर देगा कि आध्यात्मिक रूपरेखा केवल वैज्ञानिक ही नहीं है, अपितु वह आज के उन्नत वैज्ञानिक सिद्धान्तों के अनुरूप भी है।

इसलिए आज आवश्यकता है, विज्ञान को अध्यात्म के साथ समन्वय स्थापित करने की, ताकि उनके द्वारा किए गए आविष्कार मानव-जाति को विनाश के कगार की ओर नहीं,  अपितु उन्नत,  समृद्ध और खुशहाल भविष्य की ओर प्रशस्त करें।

Reference by – https://www.djjs.org/blog/