“रहस्यमय पुराण ग्रन्थ पर शोध”

YUVA SHAKTI BANARAS/ January 24, 2015/ Science & Spirituality/

 

vedas_manuscriptपुराण का परिचय

पुराण सब शास्त्रों के पहले से ही विधमान है ब्रह्मा जी सबसे पहले पुराणों का ही समरन किया था पुराण धर्म अर्थ और काम के साधक एवं परम पवित्र है इसकी रचना 100 cr करोड़ श्लोकों के साथ हुई है समय के अनुसार इतने बड़े पुराणों का श्रवण और पठन असमभव देखकर स्वयं भगवान् उसका सक्षेप करने के लिए प्रत्येक द्वापर युग में व्यास रूप से अवतार लेते है और 4 Lac लाख श्लोकों के साथ 18 पुराणों में बाँट देते है पुराणों का यह सक्षिप्त संकरण ही इस भूमण्डल में प्रकाशित होते है देवलोक में आज भी 100 cr करोड़ श्लोकों के विस्तृत के साथ पुराण मौजूद है।

पृथ्वी पर जो 4 लाख श्लोकों के साथ यह पुराण उपस्थित है क्रमानुसार इस तरह से है

(1) ब्रह्मा पुराण (2) पदम् पुराण (3) विष्णु पुराण (4) शिव पुराण (5) भागवत पुराण (6) नारद पुराण (7) मारकंडे पुराण (8) अग्नी पुराण (9) भविष्य पुराण (10) वैवत पुराण (11) नरसिम्भा पुराण (12) वराह पुराण (13) स्कन्द पुराण (14) वावन पुराण (15) कूर्म पुराण (16) मत्स्य पुराण (17) गरुड़ पुराण (18) ब्रह्मांड पुराण

पुराण का मतलब

वेद is Operator of the “पुराण”.
पुराण is details of the space “ब्रहमाण्ड”.
उपनिषाद is dictionary of the “पुराण”.

पुराण में जादुई शव्दों के द्वारा सम्पुर्ण चीजे बताई गई है इसमे विज्ञान, समाज, विद्या, धर्म, संपूर्ण ब्रहमाण्ड है

पुराण के पाँच भेद है
१) सृष्टी अर्थात space का निर्मान
२) सृष्टी अर्थात space से होने वाली सृष्टी अर्थात sapce का निर्मान
३) सृष्टी अर्थात Space का वंशजों का वर्णन
४) कौन कौन से ग्रह किस किस के पश्चात हुय का वर्णन
५) इन ग्रहों में होने वाले चरित्र का वर्णनपुराण के चार पाद है
१) प्रक्रिया (Think)
२) अनुसंग (Generate)
३) उत्पोद्वात (Operate)
४) उपसहार (Destroy)
पुराण को समझने के लिए 6 चीजों का ज्ञान होना अति आवश्यक है इसके बिना रहस्मय पुराण ग्रन्थ को नहीं समझ सकते
१) शिक्षा
२) कल्प
३) व्याकरण
४) निरुक्त
५) ज्योतिष
६) छन्द

१) शिक्षा
शिक्षा वह होता है जिसमे बच्चों को अक्षर और अंक को बताना, लिखाना, बोलना, इन सभी को कंठस्थ करानादि
इसके बाद सभी अक्षरो एवं अंको को जोरना, मात्रा बनाना, वाक्य बनाना, समूहों में सामान को व्यवथित करवान, धटवाना, ज्यादा करवाना, बाटनादि
इसके बाद अच्छे-बुरे का भेद बताना, समाज और देश के लिय कौन सा कार्य सही है वह बतानादि२) कल्प
यह संख्याओं का गाथा है इनमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की गणना की जानकारी है ये कल्प रूपी शिक्षा इस पुराण को समझने के लिय अत्यंत आवश्यक है तभी सभी चीजों के बारे में ठीक ठीक आकलन किया जा सकता है
इसमे आपको इकाई, दहाई, सैकड़ा, हजार, दसहजार, लाख, दसलाख आदि का ज्ञान कराया जाता है
इनको किस तरह से बनाया गया है और किस प्रकार से इसकी व्यवस्थापना है इसके बारे में बताया जाता है
जैसे एक मनवन्तर में देवताओं के 12000 हजार दिव्य वर्ष होते है, मनुष्यों के हिसाब से 4320000 वर्ष होते है जिसमे दिन-रात 1577917828 होते है आदि३) व्याकरण
इसके द्वारा हमें शव्दों की दूरदर्शिता के बारे में बताया जाता है जिसमे व्याकरण के 8 भागों से परिचित कराया जाता है
जैसे वर्तमान समय के राजा पुष्पमित्र होंगे अर्थात
पुष्प = फुल, मित्र = संगठन या दल या समूह आदि
अर्थात फुल समूह के लोग इस बार भारत वर्ष के राजा होंगे

४) निरुक्त
इसके द्वारा समस्त धातुओं के बारे में ज्ञान दिया जाता है किस धातु का क्या कार्य है, किस प्रकार से इन धातुओ से कार्य लिया जाता है, इनको किस प्रकार से तैयार किया जाता है किन धातु को किन परिस्थितियों में किस तरह से व्यवहार में लाना चाहिय आदि का ज्ञान कराया जाता है
जैसे:- एक मिट्टी का पात्र लें, उसमें ताम्र पट्टिका (Copper Sheet) डालें तथा शिखिग्रीवा (Copper sulphate) डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु (wet saw dust) लगाएं, ऊपर पारा (mercury) तथा दस्त लोष्ट (Zinc) डालें, फिर तारों को मिलाएंगे तो उससे मित्रावरुणशक्ति (Electricity) का उदय होगा।
इन चार प्रकार के ज्ञान के द्वारा आप एक कुशल और तरह तरह के वस्तु आदि के नव-निर्माण में पारंगत हो जाते है अर्थात आप कुशल इंजिनियर या वैज्ञानिक बन जाते है

५) ज्योतिष
इसमे आप अंतरिक्ष में विराजमान ग्रह, उपग्रह, तारे और नक्षत्र की गति और उनसे उतपन्न होने वाले प्रभाव, अंतरिक्ष के मार्ग इत्यादि चीजो के बारे में ज्ञान प्राप्त कराया जाता है
जैसे ब्राह्रा, दैवता, मनुष्य, पितृ, सूर्य, सावन, चन्द्रमा, नक्षत्र तथा बृहस्पति
ये नौ प्रकार के वर्ष अर्थात साल अर्थात ईयर निकालने का मान है अर्थात 9 तरह से सालों की गणना हो सकती है जिसे आप 365 दिन बराबर एक साल कहते हो उसी तरह आप इन 9 मानो के द्वारा 9 प्रकार के साल बना सकते हो जैसे सूर्य के हिसाब से गणना करोगे तो 365 दिन का साल होगा, अगर सावन से गणना करोगे तो 360 दिन का साल आएगा, अगर चन्द्रमा से गणना करोगे तो 354 दिन का साल आएगा अगर नक्षत्र के द्वारा गणना करोगे तो 335 दिन का साल होगा इत्यादि

६) छन्द
जब आप इन पांचों विधा में पारंगत हो जाते है आप के लिय दुनिया की कोई भी चीज दुर्लभ नहीं हो सकती अपनी बातो को आप लिखने के लिय छन्द रूपी भाषा का प्रयोग किया जाता है जो औरो के लिय यह रहस्य रहता है
जैसे SS IIS IS I S II II II

“ज्ञान-विज्ञान के हिसाब से किसे महान कहा गया है”अधिक आयु हो जाने से, बाल पक जाने से, धन से अथवा बंधू-बांधवों से कोई बड़ा नहीं होता
ऋषि-मुनियों ने यह धर्म पूर्ण निश्चय किया है की हमलोगों में जो “अनुचान” हो वही महान हैशिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्यौतिष तथा छन्द:शास्त्र के इन छ: विद्वान को वेदांग कहते है
धर्म का प्रतिपादन करने में ऋगवेद, यजुर्वेेद, सामवेद, और अथर्ववेद ये चार वेद प्रमाण है
जो द्विज श्रेष्ठ गुरु से छ: वेदांग और चार वेदों का अध्यन भली-भाती करता है वह “अनुचान” होता है
इसके अलावा करोड़ों ग्रन्थ वाच लेने से भी कोई “अनुचान” नहीं कहलाता

सनातन धर्म के हर चीज का एक सिद्धांत बनाया गया है जिससे मनुष्य भली भाती सभी चीजों की सही स्थिति को समझ सके जैसे धर्म ग्रन्थ को पढ़ने के लिय यह सिद्धांत है अगर कोई मनुष्य पुराण का वक्ता है तो उसका मुख उत्तर के तरफ होना चाहिए और सुनने वाले श्रोता का मुख दक्षिण की तरफ
इसी तरह से दूसरा सिद्धांत अगर कोई मनुष्य और धर्म का शास्त्र का वक्ता है तो उसका मुख पूर्व की ओर होना चाहिए और सुनने वाले श्रोता का मुख पच्छिम की तरह

“सिद्धांत or formula”
इसी सिद्धांत के तहद पुराण में सभी बाते दिशाओं के द्वारा बताया जा रहा है जिसका केंद्र बिंदु जम्भू द्वीप-Bermuda है जो की पृथ्वी का मध्य center है
आपके सामने पुराण का रहस्य खोलने के लिए पहले “पृथ्वी विस्तारम” के वारे में प्रत्येक चीज को प्रमाण के द्वारा बताऊंगा इसके बाद अन्य रहस्यों को उजागर करूंगा, बहुत से मनुष्य इस बात का विद्रोही होगा की यह कदाचित ऐसा नहीं हो सकता जबकि सभी बाते मैं प्रमाण के द्वारा कहूँगा उसकी सत्यता जानने के लिय आप वहा जा कर इस बात का प्रमाण ले सकते है उसके बाद ही अपना प्रतिक्रियाएं दीजिय

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम:”

रहस्यमय पुराण प्रारंभ भाग -०1यह जगत विष्णु जी से उतप्पन हुआ है, उन्ही में स्थित है, वे ही इसकी स्थिती और लय के कर्ता है तथा यह जगत भी वे ही है, यह विष्णु जी कहाँ से आये? उनकी उतपप्ती कैसे हुआ? यह कोई नहीं जनता, उन्होंने ही इस मायामय संसार की रचना सिर्फ लीलामात्र के लिए की है

विष्णु जी की वास्तविक रूप नाग है, यह नाग ही ब्रह्मा, विष्णु और शंकर है जैसे एक ही व्यक्ति के तीन प्रतिबिम्भ,

जैसे एक किसान खेत को बनाता और बीज डालता है उसके बाद खेत की रक्षा करता है उसके बाद जब फसल पक जाती है उसे काट लेते हैइस प्रक्रिया में एक किसान पहले जब खेत बनाया और बीज बोया उस समय वह ब्रह्मा का कार्य कर रहा था, जब वह खेतों के फसल की रक्षा में लगा था उस समय वह विष्णु के रूप में था जब वह फसल काटा उस समय वह शिव रूप था इसी तरह यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों एक ही है

ब्रह्मा, विष्णु और शिव जो है उनका काम उतपति, स्थिती और संहार के कारण है, उन विकार रहित शुद्ध, अविनासी, परमात्मा, सर्वदा एकरस, सर्ववीजायी, भगवान विष्णु को नमस्कार है, जो एक होकर भी नाना रूप वाले स्थूल सूक्ष्म, अव्यक्त एवं व्य्क्त रूप में सम्पूर्ण ब्रहमाण्ड से लेकर पृथ्वी तक अपने आप को स्थित कर रखे है, जो परे से भी परे है, परमश्रेष्ठ, अन्तरात्माओं में स्थित परमात्मा, रूप, वर्ण, नाम, विशेषण आदि से रहित है, जिसमे जन्म, वृद्धि, परिमाण, क्षय और नाश इन छह: विकारो का सर्व्था अभाव है, वे सर्वत्र है, और समस्त विश्व बसा हुआ है इसलिए विद्वानों ने नित्य, अजन्मा, अक्षय, अव्यय, एकरस, परब्रह्मा कहा है |

1. ब्र्ह्मा जी के रूप में सृष्टी की रचना करते है
2. विष्णु जी के रूप में सृष्टी का पालनकर्ता है
3. शंकर जी के रूप में समस्त चीजो का संहार कर देते है

रहस्यमय पुराण प्रारंभ भाग -०2भूमण्डल विस्तार वरणम्

इस भूमण्डल का वृतांत सक्षेप में बताता हूँ जम्बू Bermuda, प्लक्ष Hawaii, शाल्मली Maui, कुश Mplokai, क्रोच्च Oahu, शाक Kauai और पुष्ककर Niihau ये सातों द्वीप ब्रह्मा जी द्वारा सबसे पहले स्थापित किया गया जो एक के बाद एक तिरक्षे होते चले गए है ये सभी द्वीप चारो ओर से खारे पानी इक्षुरस, मदिरा, धृत, दही, दुग्ध, और मीठे जल के सात समुद्रों से घिरा है सातों द्वीपों के भीतर वर्तमान हजारों छोटे छोटे द्वीप है जिनसे यह जगत व्याप्त है इसी सात द्वीप में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का भेद है

जम्बूद्वीप रूपी पृथ्वी चारों तरफ से चौड़ाई और लम्बाई में सब ओर से बराबर एक लाख योजन की है इस लाख योजन वाले द्वीप में बहुत से जनपद, सिद्द्ग चारणों से व्याप्त है जम्बू द्वीप के मेरु के चारों तरफ नौ वर्ष व्याप्त है जिसका नाम भारतवर्ष, किम्पुरुषवर्ष (Europe), हरिवर्ष (Africa), रम्यकवर्ष (North America), हिरमन्यवर्ष (South America), करूदेश (Denmark), दक्षिण में एक महान शैलपर्वत है जिसे मालयवानवर्ष (Australia) कहते है, धनु देश or भद्राश्व (South Atlantic) और संस्थ: देश or केतुमाल देश (North Atlantic) हैइन सभी वर्षों के मध्य में विष्कम्भ नामक पर्वत है जिसकी लम्बाई और चौड़ाई 9 हजार योजन है इस विष्कम्भ नामक पर्वत पर इलावृत देश है

इलावृत देश पृथ्वी के मध्य में स्थित है जिसे आजकल Bermuda के नाम से जाना जाता है जिसका आकार आधे चन्द्रमा के सामान है

रहस्यमय पुराण प्रारंभ भाग -०3

रहस्यमय पुराण प्रारंभ भाग -०3भूमण्डल विस्तार वरणम्

पृथ्वी के मध्य और बरमूडा द्वीप के चित्र द्वारा स्थान के बारे में बताना

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भूमण्डल विस्तार वरणम्इस इलावर्त वर्ष Bermuda के ठीक आगे के मध्य center के बीचो बीच में सुवर्णमय मेरुपर्वत है जिसे आजकल के मनुष्य Magnetic-Hole कहते है यह Magnetic-Hole रूपी मेरु पर्वत प्रचंड सूर्य के सामान, बिना धुएं के अग्नी रूपी स्वच्छ सीसे के सामान खड़ा है

जैसे आप पानी को गरम करते हो तो उससे भाप उतपन्न होती है वह भाप 700 डिग्री सेल्सियस से निचे गर्म होने पर हमें दिखाई देता है परन्तु अगर 700 डिग्री सेल्सियस के ऊपर जब हम इस भाप को और तपाते है तो यह दिखाई देना बंद हो जाता है अगर इसे कांच के जार में देखेंगे तो वह हमें नहीं दिखाई देता तब अगर हम किसी भी रोशनी को उसके आर पार करना चाहे तो रोशनी उस भाप को आर पार नहीं कर पाती है इसी तरह से यह Magnetic-Hole रूपी मेरु पर्वत है जिसमे से कोई भी रोशनी आर-पार नहीं कर सकता चाहे वह सूर्य या चन्द्रमा की ही क्यों ना किरणे हो यही इस पर्वत का होने के प्रमाण है इसके पास कोई भी जीव नहीं जा सकताइस Magnetic-Hole की उचाई 84000 हजार योजन है और निचे की ओर यह 16000 हजार योजन पृथ्वी में घुसा हुआ है इसकी पृथ्वी के अंदर से लेकर अंतरिक्ष तक की लम्बाई एक लाख योजन है इस Magnetic-Hole रूपी मेरु पर्वत के शिखर पर जा कर इसका विस्तार 32000 हजार योजन का हो गया है और 96 योजन की दूरी में चारों तरफ से फैला है यह मेरु के शिखर का प्रमाण है

जैसे शराब के प्याले होती है उसी तरह यह Magnetic-Hole निचे पेंदी में चौड़ा इसके बाद गरदन की तरह पतला ऊपर के तरफ और ज्यादा चौड़ा Magnetic-Hole रूपी मेरु पर्वत पृथ्वी रूपी कलम के कर्णिका के रूप में स्थित है

समुन्द्र के निचे के मेरु पर्वत Magnetic-Hole की स्थिति का संक्षेप वर्णन

मेरु Magnetic-Hole की लम्बाई और चौड़ाई एक लाख योजन है इसमे हिमवान, हेमकूट, निषध, मेरु, नील, श्वेत और श्रींगवान ये सात पृथ्वी के मर्यादा पर्वत है और इन सब पर्वतो की दूरी नौ-नौ हजार योजन की है ये सभी दो हजार योजन लम्बे और दो हजार योजन चौड़े है तथा इसकी उचाई 1 लाख से 80 हजार योजन की है इन सब पर्वतों में मेरु Magnetic-Hole सबके मध्य center में स्थित है ये सभी पर्वत समुन्द्र के भीतर स्थित हैपृथ्वी के निचे मूल तहलटी में मेरु रूपी Magnetic-Hole जो 16000 हजार योजन तक धसा हुआ है 48 हजार योजन में गोलाई से चारो तरफ फैला हुआ है इसके चारो ओर चार पर्वत है ये चारों पर्वत मानों मेरु को धारण करने के लिय ईश्वर के द्वारा बनाई किलियाँ है इन चारों किलीयां रूपी पर्वत के पूर्व में मंदराचल, दक्षिण में गंधमादन, पश्छिम में विपुल और उत्तर में सुपाश्र्वा है ये सभी चारों पर्वत दस दस हजार योजन ऊँचे है इन पर्वतों के शिखर पर गयारह ग्यारह सौ योजन ऊंची कदम्ब, जम्बू, पीपल और वट के वृक्ष ध्वजा के समान खड़े है
जो अत्यंत समृद्धशाली देवताओं, दैत्यों और अप्सराओं उनकी सुरक्षा में सनंद्ध रहते है इसके बाद मेरु के मर्यादा रूपी 8 पर्वत आठों दिशाओं में खड़ी है इसके बाद चौदह दूसरे पर्वत है जो सात द्वीप वाली पृथ्वी को अचल रखने में सहायक है अनुमानत: उन पर्वतों की तिरछी होती हुई ऊपर तक की चौड़ाई दस हजार योजन होगी इस पर जगह जगह हरिताल, मैनशिला आदि धातुय तथा सुवर्ण एवं मणिमण्डित गुफाय है जो इसकी शोभा बढ़ाती है सिद्धों के अनेक भवन तथा क्रीड़ा स्थान से संपन्न होने के कारण इसकी प्रभा सदा दीप्त होती रहती हैमेरु गिरी के पूर्व भाग में मंदराचल, दक्षिण में गंधमादन, पच्छिम में विपुल और उत्तरभाग में सुपाश्र्वा पर्वत है उन पर्वतों पर चार महान वृक्ष है इन चारों वृक्षों में जम्बू वृक्ष के कारण इलावृत वर्ष को जम्बू द्वीप के नाम से भी जाना जाता है और इस कारण सम्पूर्ण पृथ्वी को जम्बू द्वीप भी कहते है इलावृत प्रदेश Bermuda सभी ओर से 34 हजार योजन प्रमाण से बताया गया है

यह मेरु यंत्र है जिसके द्वारा आप पृथ्वी की सरचनाय समझ सकते है
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समुंद्र के ऊपरी भाग का संक्षेप में वर्णन

हिमबानपर्वत पर भारतवर्ष, हेमकुटपर्वत पर किम्पुरुषवर्ष (Europe), नषेधपर्वत पर हरिवर्ष (Africa), नीलपर्वत पर रम्यकवर्ष (South America), श्वेतपर्वत पर हिरमन्यवर्ष (North America), श्रींगवानपर्वत पर करूदेश (Denmark), निषध के दक्षिण में एक महान शैलपर्वत है जिसे मालयवानवर्ष (Australia) कहते है, उत्तर दिशा में धनु देश or भद्राश्व (North Atlantic) और दक्षिण दिशा में संस्थ: देश or केतुमाल देश (South Atlantic) है उत्तरकुरु वर्ष रूपी डेनमार्क भारत वर्ष के समान हैइलावृत वर्ष Bermuda के उत्तर Denmark में जो श्रिंगवान नामक पर्वत है इसके तीन शंकु रूपी पर्वत है जो उत्तर से दक्षिण के तरफ फैले हुय है इसमे बीच वाला श्रृंगी पर्वत “विषुवत रेखा” का विभाजन करता है इन देशों की प्रत्येक की चौड़ाई दो हजार योजन है तथा लम्बाई में पहले की अपेकक्षा पिछला क्रम से दसमांश से कुछ अधिक कम है चौड़ाई और उचाई तो सभी का समान है

क्रम से नील, श्वेत और श्रिंगवान नाम के तीन पर्वत है जो रम्यक रूपी North America, हिरमण्य रूपी South America और कुरु रूपी Denmark नाम के वर्षों को सीमा बांधता है ये पूर्व से पच्छिम तक खारे पानी के समुद्र तक फैला हुआ है

इलावृत देश Bermuda के दक्षिण में एक के बाद एक निषध, हेमकूट और हिमालय नाम के तीन पर्वत है ये पर्वत भी पूर्व से पच्छिम तक फैले हुय है ये दस दस हजार योजन ऊँचे है इनमे क्रम से हरिवर्ष रूपी Africa, किम्पुरुष रूपी Europe और भारत वर्ष रूपी Asia के सीमाओं को विभाग करता है

गन्धमादन और माल्यवान नाम के दो पर्वत है इनकी चौड़ाई दो दो हजार योजन की है ये भद्राश्व रूपी North Pole और केतुमाल रूपी South Pole नामक दो वर्षों की सीमा निश्चित करते है

इस पृथ्वी के केंद्र मेरु पर्वत Bermuda (Magnetic Hole) है, जहां पृथ्वी की अंतिम सीमा है, वहा लोकालोक पर्वत (Ka’ula Island) की स्थिति है यह सूर्य और ब्रह्माण्ड का केंद्र है | मेरु Bermuda (Magnetic Hole) और लोकालोक पर्वत Ka’ula Island (Black Hole)के बिच में सात समुद्र और सात द्वीप है

जो लोकालोक नामक पर्वत Ka’ula Island है जो अत्यंत काले घनघोर स्तम्भ के सामान अंतरिक्ष के अंतिम सीमा तक स्थापित है यह पृथ्वी के सब ओर सूर्य आदि के द्वारा प्रकाशित और अप्रकाशित प्रदेशों के बीच में उनका विभाग करने के लिए स्थित है इसे परमात्मा ने त्रिलोकी के बाहर उसके चारों और सीमा के रूप में स्थापित किया है यह इतना उचा है और लंबा है की इसके एक और से तीनों लोको को प्रकाशित करने वाली सूर्य से लेकर ध्रुव पर्यनत समस्त ज्योति मंडल की किरणे दूसरी और नही जा सकतीजैसे बरमूडा के टैगल में किसी जीव को प्रवेश वर्जीत है उसी तरह यह लोकालोक प्रदेश भी जीव से रहित है
इसके ऊपर चारों दिशाओं में समस्त संसार के गुरु स्वयंभू श्री ब्रह्माजी ने सम्पूर्ण लोकों के स्थित के लिय ऋषभ, पुष्करचुड़, वामन, और अपराजित नाम के चार गजराज नियुक्त किये हैइन दिगज्जों की और अपने अंश स्वरुप इन्द्रादि लोकपालों की विविध शक्तियों की वृद्धि तथा समस्त लोकों के कल्याण के परम ऐश्वर्य के अधपति सर्वान्तर्यामी परम पुरुष श्री हरी अपने विश्वकसेन आदि पार्षदों के सहित इस पर्वत पर सब ओर विराजते है वे अपने विशुद्ध सत्व को जो धर्म, ज्ञान, वैराग्य, और ऐश्वर्य आदि आठ महा सिद्धियों से संपन्न है धारण किये हुय है उनके कर कमलों में शंख-चक्र आयुध सुशोभित है इस प्रकार अपनी योग माया से रचित विविध लोकों की व्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिय वे इसी लीलामय रूप के कल्प के अनत तक वहाँ सब ओर रहते है

मेरु (Bermuda) Magnetic-Hole से लेकर मानसोत्तर पर्वत Ka’ula Island तक जितना अंतर है मनसोत्तर पर्वत से उतनी ही दूरी पर, उतनी ही भूमि शुद्धोदक समुन्द्र की है मेरु शिखर से गंगा जी इसी मार्ग से पृथ्वी पर उतरती है जिसे वर्तमान समय में Bermuda का ट्रैंगल कहा जाता है इसमे गिरी हुई कोई वस्तु फिर नहीं मिलती वहा देवताओं के अतिरिक्त और कोई प्राणी नहीं रहता है

उसके आगे इलावृत वर्ष है इसके आगे अग्निरूपी स्वर्णयमय मेरु भूमि है जो दर्पण के सामान स्वच्छ है

पृथ्वी पर के वर्षो और द्वीपों का संक्षेप में वर्णन

1) जम्बू द्वीप (BERMUDA)इस सम्पूर्ण भूमण्ड को जम्बू द्वीप कहते है पृथ्वी के बीचो बीच में स्थित इलावृत वर्ष (Bermuda Island) है इसे मेरु वर्ष भी कहते है वहा सूर्य नहीं तपती और मनुष्यों को वृद्धा अवस्था नहीं सताती चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र और ग्रहों की किरणे वहाँ प्रकाश में नहीं आती क्योकी स्वयं मेरु पर्वत की प्रभा उन सब प्रकाश की अपेक्षा बढ़ कर होती है इलावृत वर्ष (Bermuda Island) का आकार आधे चन्द्रमा के सामान है

इस इलावर्त वर्ष के ठीक आगे के मध्य के बीचो बीच में सुवर्णमय मेरुपर्वत है जिसे आजकल के मनुष्य Magnetic-Hole कहते है यह Magnetic-Hole रूपी मेरु पर्वत प्रचंड सूर्य के सामान, बिना धुएं के अग्नी रूपी स्वच्छ सीसे के सामान खड़ा है

जम्बू द्वीप के पूर्व भाग में स्वेत वर्ण वाले जो प्राणी है वह ब्राह्मण है, जो दक्षिण की ओर पीतवर्ण है उन्हें वैश्य माना जाता है जो पच्छिम की ओर भृगुराज की पत्र की आभा वाले है उनको शूद्र कहा गया है मेरु के उत्तर भाग में संचय करने के इच्छुक जो प्राणी है जिनका वर्ण लाल है उन्हें क्षत्रिय की संज्ञा प्राप्त है इस प्रकार वर्णों की विभाग किया गया है

(2) पुष्ककर द्वीप NIIHAU ISLANDपुष्कर द्वीप कि लम्बाई 2.5 योजन अर्थात ढाई योजन और चौड़ाई आधा योजन है यही उस द्वीप का परिमाण है, पुष्कर द्वीप अपने समान विस्तार वाले मीठे जल के समुद्र से धीरा है ब्रह्मा जी द्वारा पृथ्वी पर निर्मित एक उत्तम तीर्थ है जो पुष्ककर नाम से विख्यात है वहाँ दो प्रसिद्द पर्वत है जिन्हे मर्यादा और यज्ञ पर्वत कहते है उन दोनों के बिच में तीन यज्ञ कुंड है जिनके नाम ज्येष्ठ पुष्ककर, माध्यम पुष्ककर और कनिष्ट पुष्ककर है यह पृथ्वी पर तीर्थो में श्रेष्ठ तीर्थ और क्षेत्रों में उत्तम क्षेत्र है वहाँ एक अवियोगा नाम वाली चकौर बावली है तथा एक दूसरा जल से युक्त कुआं है जिसे सौभाग्य कूप कहते है यह तीर्थ प्रलय-प्रर्यंत रहता है अवियोगा नाम वाली चकौर बावली जो है उसका दर्शन करने से ईहलोक या परलोक में स्थित, जीवित या मृत सभी प्रकार से बंधुओं से भेट होती है यही श्री रामचन्द्र जी को अपने पिता का स्वपन्न में दर्शन दिया था जब वह पिता का पिंड दान देने के लिए आये थे यही पर उन्होंने अवियोगा नाम वाली चकौर बावली में स्नान किया, और मध्य पुष्ककर में पिता का श्राद्ध किया उसके बाद पश्चिम दिशा की ओर 1 कोस चलने पर (3.25 KM) ज्येष्ठ पुष्ककर तक जा पहुचे और 1 माह तक रहकर तप किया

उस द्वीप में एक ही वर्ष पर्वत है पुष्करद्वीप के मध्यभाग में वलयाकार रूप में स्थित है वह पुष्कर द्वीप को बीच से चीरता हुआ सा खरा है उसी से विभक्त होकर उस द्वीप के दो खंड हो गए है प्रत्येक खंड गोलाकार है और उन दोनों खण्डों के बीच में वह महापर्वत स्थित है उनके दोनों खंडो में ना कोई नदी है न दूसरा पर्वत

पुष्ककर द्वीप NIIHAU ISLAND के चित्र
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(3) शाक द्वीप (Kaua’i Island)

शाकद्वीप के निवासी बड़े पवित्र और दीर्धजीवी होते है दरिन्द्रता बुढ़ापा,और व्याधि का उन्हें पता नहीं रहता, इस शाक द्वीप में सात ही मर्यादा पर्वत है इस द्वीप के दोनों और समुन्द्र है एक ओर लवण समुन्द्र और दूसरी ओर क्षीर समुन्द्र वहा पूर्व में फैला हुआ हुआ महान पर्वत उदयाचल के नाम से प्रसिद्द है उसके ऊपर भाग में जो पर्वत है उसका नाम जलधार है उसी को लोग चंद्रगिरी भी कहते है इंद्रा वही से जल लेकर वर्षा करते है उसके बाद श्वेताक नाम का पर्वत है उसके अंतगर्त छ: छोटे-छोटे पर्वत है वहा की प्रजा इन पर्वतों पर अनेक प्रकार की मनोरंजन करती है उसके बाद रजत गिरी है उसी को जनता शाकगिरी भी कहती है उसके बाद आम्बिकेय पर्वत है जिसे लोग विभ्राजक तथा केसरी भी कहते है वही से वायु का प्रभाव आरम्भ होता है वहा जो 7 मर्यादा पर्वत है उन्ही के नाम पर खंड या वर्ष प्रसिद्द है यहाँ पर्वतों के दो-दो नाम है जैसे उदय, सुकुमार, कुमारी, जलधार, क्षेमक, और महाद्रुम इसके मध्य में शाक नाम के वृक्ष है उसके पत्तों को छूकर बहने वाली वायु का स्पर्श होने से बड़ा आनंद मिलता है वहा सात बड़ी-बड़ी नदियां है एक-एक नदी के दो नाम है जो सब पापों को नाश करने वाली है उनके नाम ये है सुकुमारी, कुमारी, नलिनी, रेणुका, इक्षु, धेनुका तथा गभस्ति

इनके अतिरिक्त वहाँ छोटी-छोटी हजारों नदिया है पर्वत भी सहस्त्रों की संख्या में है स्वर्ग भोगने के बाद जिन्होंने पृथ्वी पर आकर जलद आदि वर्षो में जन्म ग्रहण किया है वे लोग प्रसन्न होकर इन नदियों का जलपान करते है इन सातों वर्षों में धर्म का ह्रास पारस्परिक संधर्ष अथवा मर्यादा का उल्लंघन कभी नहीं होता मग, मागध, मानस, तथा मन्दग ये ही वहा के चार वर्ण है जो सूर्यरूप धारी श्री नारायण को पूजते है मग-सर्वश्रेष्ठ ब्रहामण, मागध-क्षत्रिय, मानस-वैश्य और मन्दग-शूद्र समझना चाहिय

(4) क्रोच्च द्वीप (Oahu Island)क्रोच्च द्वीप दीपों के क्रम में यह चौथा द्वीप है क्रोच्च द्वीप के राजा द्युतिमान है महात्मा धुति के सात पुत्र है महात्मा धुति अपने पुत्रों के ही नाम पर क्रोच्च द्वीप को सात विभाग किये जिसका नाम कुशग, मन्दग, उष्ण, पीवर, अन्धकारक, मुनी, और दुन्दुधि

क्रोच्च द्वीप में भी बड़े मनोरम सात वर्ष पर्वत है जिनपर देवता और गंधर्व निवास करते है उनके नाम ये है क्रोच्च, वामन, अन्धकारक, धोड़ी के मुख के समान रत्नमय देवव्रत, धर्म, पुण्डरीकवान, तथा महा पर्वत दुन्दुभी ये सभी पर्वत क्रम से एक दूसरे से दुगुने बड़े होते चले गए है द्वीप भी परस्पर एक दूसरे से दुगुने बड़े होते चले गए है जितने द्वीप है, द्वीपों में जितने पर्वत है, तथा पर्वतों द्वारा सीमित जितने भी वर्ष है उन सभी रमणीय प्रदेशों में देवताओं सहित समस्त प्रजा बेखट होकर निवास करती है

क्रोच्च द्वीप में पुष्कल, पुष्कर, धन्य और ख्यात ये चार वर्ण है जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कहे जाते है वहा छोटी बड़ी सैकड़ों नदिया है जिनमे सात प्रधान नदिया है गौरी, कुमुद्वती, संध्या, रात्री, मनोजवा, ख्याति, तथा पुण्डरीका क्रोच्च द्वीप के निवासी इन्ही नदियों के पानी पीते है वहा पुष्कर आदि वर्णो के लोग यज्ञ के समीप ध्यान योग के द्वारा रूद्र स्वरुप भगवान जनार्दन का यजन करते है क्रोच्च द्वीप अपने सामान परिमाण वाले दधिमण्डोद नामक समुन्द्र से धीरा हुआ है

क्रोच्च द्वीप में बहुत बड़ा क्रोच्च पर्वत है इसी के नाम पर इस का क्रोच्च द्वीप नाम हुआ पूर्वकाल में श्री स्वामी कार्तिके जी के शास्त्र प्रहार से इसका कटिप्रदेश और लता निकुज्जादि क्षत विक्षत हो गए थे किन्तु क्षीर समुन्द्र से सींचा जाकर और वरुणदेव से सुरक्षित होकर यह फिर निर्भय हो गया है जिसे आजकल के वैज्ञानिक इस पर उलका गिरने का तर्क लगाते है

उस द्वीप में सात प्रधान पर्वत है पहला जो क्रोच्च पर्वत है उसे लोग विधुल्लता, रैवत और मानस नाम से भी पुकारते है अन्य पर्वतों के दो-दो नाम है जैसे पावन-अंधकार, अच्छोदक-देवावृत, सुराप-दविष्ठ, कांचननशृंग-दीनन्दन, गोविन्द-द्विविंद, पुण्डरीक-टोयासाह यह सातो रत्नमय पर्वत है जो एक से एक अधिक उचे होते चले गए है

क्रोच्च द्वीप के वर्ष भी दो-दो नामों से पुकारे जाते है जैसे कुशल-माधव, वामक-संवर्तक, उष्णवान-सप्रकाश, पावनक-सुदर्शन, अन्धकारक-संमोह, मुनिदेश-प्रकाश, दुदुन्धी,-अनर्थ वहा नदिया भी सात ही है ये भी दो दो नाम से पुकारी जाती है जैसे गौरी-पुष्पवाहा, कुमुद्वती-आर्द्रवती, रौद्रा-संध्या, सुखावहा-भोगजवा, क्षिप्रोदा-ख्याती, बहुला-पुण्डरीका कहते है देश के वर्ण वैचित्र्य से प्रभावित अनेको छोटी-छोटी नदियां है

(5) कुश द्वीप (Mplokai Island)कुश द्वीप में ज्योतिष्मान राजा है जिसके सात पुत्र है इनके ही नाम से यहा सात वर्ष है उद्दिद, वेनुमान, सूरत, रन्धन, धृति, प्रभाकर, और कपिल है वहा मनुष्यों के साथ साथ दैत्य, दानव, देवता, गंधर्व, यक्ष, और किन्नर आदि भी निवास करते है वहा के मनुष्यों में भी चार वर्ण है जो अपने अपने कर्तव्य के पालन में ततपर है उन वर्णों के नाम इस प्रकार है डमी, शुष्मी, स्नेह, तथा मन्देह ये क्रम से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के श्रेणी में बताये गए है वे शासतोक्त कर्मो का ठीक ठीक पालन करते और अपने अधिकार के आरम्भक कर्मो का क्षय होने के लिय कुश द्वीप में ब्रह्मा रूपी भगवान जनार्दन का यजन करते है

विद्रुम, हेमशैल, द्युतिमान, पुष्टिमान, कुशेशय, हरी, और मंदराचल ये सात पर्वत वहा के वर्ष पर्वत है और नदिया भी सात ही है धूतपापा, शिवा, पवित्रा, सम्मति, विधुत, अम्भस्, तथा मही, ये सब पापों के हरण करने वाली है इसके अलावा वहा बहुत से छोटी छोटी नदिया और पर्वत है कुश द्वीप में कुशों का बहुत बड़ा वन है अत: उसी के नाम पर उस द्वीप की प्रसिद्धि है वह द्वीप अपने ही बराबर विस्तार वाली धी के समुद्र से धीरा हुआ है

कुश द्वीप में जो सात कुल पर्वत है उन सभी पर्वतों के दो दो नाम है जैसे कुमुद-विद्रुम, उन्नत-हेम, ड्रोन-पुष्पवान, कनक-कुश, ईश-अग्निमान, महिष-हरी, इस पर अग्नि का निवास है जो हर साल दिखाई देता है (अर्थात प्रत्येक वर्ष कुश की झाड़ी में अपने आप आग लग जाती है जिस पर वैज्ञानिकों ने काफी शोध किया और कर रहे है किन्तु अभी तक उन्हें इस पर आग लगाने की कारण को समझ नहीं सका है) ककुध्र-मंदर ये सभी कुश द्वीप में व्यवस्थित है

इन पर्वतों से विभाजित भूभाग ही विभिन्न वर्ष या खंड है उनमे से एक-एक वर्ष के दो नाम है कुमुद पर्वत से वर्ष का नाम श्वेत या उद्धिद कहा जाता है अंतगिरी पर्वत के पास लोहित-वेणुमंडल नाम से है वहालकपर्वत के पास जीमूत या रथकार है द्रोणागिर के पास के वर्ष को हरी-बलाधान कहते है

यहाँ भी सात नदिया है प्रत्येक नदिया के दो नाम है जैसे प्रतोया-प्रवेशा, शिवा-यशोदा, चित्रा-कृष्णा, ह्रदीनी-चंद्रा, विधुल्लता-शुक्ला, वर्णा-विभावरी, महती-धृति कहते है यहां और भी अन्य छोटी छोटी अनेको नदिया है
यह कुश द्वीप के अवान्तर भाग का वर्णन है कुशद्वीप के मध्य में एक बहुत बड़ी कुश की झारी है जहा प्रत्येक वर्ष अग्निदेव यज्ञ प्रज्जोलित करते है इसी कुश के झाड़ी के कारण इसका नाम कुश द्वीप पड़ा है

(6) शाल्मल द्वीप (Maui Island)शाल्मल द्वीप के स्वामी वीर वपुष्मान है उनके सात पुत्र है और इन्ही के नाम पर सात वर्ष है जिनके नाम यह है श्वेत, हरित, जीमूत, रोहित, वैद्युत, मानस, तथा सुप्रभ

शाल्मल द्वीप इक्षुरस समुन्द्र के द्वारा सब ओर से धीरा हुआ है वहाँ भी सात ही वर्ष पर्वत है जहा रत्नों की खाने है सभी पर्वत पीले सुवर्णमय है नदिया भी सात है पर्वतो के नाम कुमुद, उन्नत, वलाहक, द्रोण, कंग, महिष, तथा इन पर्वतो में श्रेष्ठ ककूधान है इनमे द्रोण पर्वत पर कितनी ही महौषधियां है यहाँ के नदियों के नाम श्रोणी, तोया, वितृष्णा, चन्द्रा, शुक्रा, विमोचनी, तथा निवृत्ती है वहा श्वेत, हरित, जीमूत, रोहित, वैद्युत, मानस, तथा सुप्रभ सात वर्ष है जिनमे चार वर्णों के लोग निवास करते है जिसे कपिल, अरूण, पीत और कृष्ण वर्ण कहते है जो क्रम से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र माने जाते है ये सब यज्ञ पारायण हो सबके आत्मा, अविनाशी, एवं, यज्ञ में स्थित भगवान विष्णु की वायु रूप में आराधना करते है इस अत्यंत मनोहर द्वीप में देवगन सदा विराजमान रहते है वहाँ शाल्मली नाम का महान वृक्ष है जो उस द्वीप के नाम करन के कारण बना है यह द्वीप अपने सामान विस्तार वाला सुरा के समुद्र से धीरा है और वह सुरा रूपी मदिरा के समुद्र शाल्मल द्वीप से दुगुना विस्तार वाला कुश द्वीप द्वारा सब ओर से आवृत है इस प्रकार संक्षेप में शाल्मल द्वीप का वर्णन किया है

(7) पल्क्ष द्वीप (Hawaii Island)जिस प्रकार जम्बूद्वीप खारे समुन्द्र के पानी से धीरा हुआ है उसी प्रकार उस समुन्द्र को भी धेरकर प्लक्ष द्वीप स्थित है द्वीप में सात जिहहों वाले अग्निदेव विराजते है अर्थात सात ज्वालामुखी है उस द्वीप के मध्य भाग में प्लक्ष नाम के बहुत बड़ा वृक्ष है उसी के नाम पर उस द्वीप को प्लक्ष द्वीप पड़ा है
पल्क्ष द्वीप के निवासी वैभ्राज नाम से विख्यात है आर्य, कुरु, विविंश तथा भावी यहाँ के वर्ण है चन्द्रमा इनके आराध्यदेव हैप्लक्ष द्वीप के राजा मेधातिथि के सात पुत्र हुय उनमे ज्येष्ठ पुत्र का नाम शांतमय है उससे छोटे क्रम से शिशिर, सुखोदय, आनंद, शिव, क्षेमक, तथा ध्रुव है ये सभी प्लक्ष द्वीप के राजा है इन्ही के नाम पर इस द्वीप में सात वर्ष है उनकी सीमा करने वाले सात मर्यादा पर्वत है उनके नाम क्रम से गोमेद, चन्द्र, नारद, दुंदुभी, सोमक, सुमना, तथा वैभ्राज ये सात वर्ष पर्वत है इन रमणीय पर्वतों पर देवताओं और गन्धर्वों सहित वहाँ की प्रजा निवास करती है उन सब में पवित्र जनपद है वीर पुरुष है ये चिरकाल तक जीवित रहकर मरते है मानसिक चिन्ताय तथा व्याधियां भी नहीं सताती वहाँ हर समय सुख मिलता है

प्लक्ष द्वीप में सात ही ऐसी नदिया है जो समुद्र में जा मिलाती है अनुतप्ता, शिखा, विप्राशा, त्रिदेवा, क्रमु, अमृता, तथा सुकृता ये सात वहा के मुख्य नदिया है इस प्रकार प्लक्ष द्वीप के प्रधान प्रधान पर्वतो और नदियों का वर्णन किया है

छोटी छोटी नदिया और छोटे छोटे पहाड़ हजारो है इन लोगों में ह्रास अथवा बृद्धि नहीं होती इन वर्षों में युगों की व्यवस्था नहीं होती वहा सदा ही त्रेता युग के सामान समय रहता है

प्लक्ष द्वीप से लेकर शाकद्वीप तक तक सदा त्रेता युग के समान समय रहता है यहां के लोग निरोग जीवन व्यतीत करते है इनमे वर्ण आश्रम विभाग अनुसार पांचों धर्म वर्तमान रहते है अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचार्य और अपरिग्रह ये पाचँ धर्म कहे गए है इस प्रकार संक्षेप में पल्क्ष द्वीप का वर्णन किया है

कल्प विस्तार वरणम्कल्प गणना ०१

ब्रह्माण्ड की आयु वेदिक गणना के अनुसार

ब्र्ह्मा जी के अपने निजी मान से उनकी आयु 100 वर्ष माने गए है ब्रह्मा जी की इस 100 वर्ष आयु को “पर” कहते है, आधे को “परार्ध” कहते है और ब्र्ह्मा जी के एक दिन के आयु को “कल्प” कहते हैब्र्ह्मा जी के एक दिन रूपी कल्प में चौदह मनवन्तर होते है, एक देवताओं के समूह के कार्यकाल को एक मनवन्तर कहते है, सूर्य से लेकर सप्तऋषि तारे तक के स्थान, देवताओं का निवास स्थान है जब मनवन्तर की समाप्ति होती है तो सूर्य से लेकर सप्तऋषि तारे तक के स्थान का संहार हो जाता है और यह सभी देवता अपने कर्म के अनुसार कुछ बैकुंठ धाम, कुछ ब्रह्म धाम को चले जाते है वह फ़िर इस लोक मे वापिस नहीं होते जो देवता उस लोक नही जा पाते वह पुन जन्म लेकर फ़िर से कर्मयोग के द्वारा बैकुंठ धाम जाने के लिय कार्य करते है इस तरह ब्रह्मा जी के एक दिन मे चौदह मनवन्तर आते और जाते है

सभी मनवन्तर एक सामान होता है किन्तु सभी मनवन्तर में जीवों की शक्ल सूरत भिन्न भिन्न होती है जैसे चाक्षुस मनवन्तर में मानव रूपी जीव की शक्ल बिल्ली के सामान था और इस वर्तमान वैवस्त मनवन्तर में दो पैर, दो हाथ और एक सर वाला है अगले मनवन्तर में दो पैर, चार हाथ से अधिक वाले जीव रूपी मानव होंगे

कल्प गणना ०2ब्रह्माण्ड की आयु वेदिक गणना के अनुसार

देवताओं के एक मनवन्तर में 71 चतुर्युग होते है एक चतुर्युग में 4 काल होते है जिसका नाम (1) सत्य-युग, (2) त्रेता, (3) द्वापर और (4) कलयुग हैदेवताओं के 71 चतुर्युग के आयु को 12000 हजार दिव्य वर्ष के रूप मे कहते है क्योकीं पृथवी पर तीन तरह के दिन रात होते है यह तीनों दिन रात मनुष्य, पितर और देवताओं के लिए होता है | पहला 30 मुहर्त के बराबर जो दिनरात होते है यह मनुष्यों के लिय होता है| दूसरा पृथ्वी के उत्तरायण भाग के कुरु देश में मणिमय प्रदेश मे पित्तरों का दिनरात होता है जिसे आजकल अलास्का (Alaska) कहते है उसे संधया और संध्यांश कहते है इस मणिमय प्रदेश मे दिनरात एक साथ स्थित रहते है कुछ क्षेत्र मे दिन और कुछ क्षेत्र मे रात होती है युग के हिसाब से सभी क्षेत्र मे दिन रात होते है | तीसरा पृथवी के उत्तरायण North Pole और दक्षिणायन भाग South Pole मे देवताओं के दिनरात होते है वहा मनुष्यों के 6 महीना बराबर दिन और 6 महीना बराबर रात होतीं है यह दिनरात देवताओं का एकदिन होता है जिसे देवताओं का दिव्य दिन कहा जाता है उत्तरायन North Pole मे जब सूर्य होता है तब देवताओं का दिन होता है और राक्षसों के लिय रात होती है जब दक्षिणायण South Pole मे सूर्य होता है वह देवताओं की रात होती है और राक्षसों के लिय दिन होती है इस तरह मनुष्यों, पित्तरों, राक्षसों और देवताओं के दिन रात का विभाग किया गया है

कल्प गणना ०3ब्रह्माण्ड की आयु वेदिक गणना के अनुसार

इस वर्त्तमान समय में ब्रह्मा जी के दिन रूपी कल्प के मनवन्तर का नाम इस प्रकार है(1) स्वयंभू मनवन्तर (2) सवारोचिष मनवन्तर (3) उत्तम मनवन्तर (4) तामस मनवन्तर (5) रैवत मनवन्तर (6) चाक्षुस मनवन्तर (7) वैवस्वत मनवन्तर (8) सूर्यसावर्ण मनवन्तर (9) दक्षसावर्ण मनवन्तर (10) ब्रहासावर्ण मनवन्तर (11) धर्मसावर्ण मनवन्तर (12) रूद्रसावर्ण मनवन्तर (13) रोचमान मनवन्तर (14) भौत्य मनवन्तर

ब्रह्मा जी के एक दिन रूपी कल्प में इन चौदह मनवन्तर मे 6 मनवन्तर बीत चुका है अभी सातवा मनवन्तर चल रहा है जिसका नाम वैवस्त मनवन्तर है और आठ से चौदह मनवन्तर जो है वह इस मनवन्तर के बीत जाने के बाद एक एक कर के आयेगा और जायेगा इस तरह से ब्रह्मा जी के एक दिन की समाप्ति होती है ब्रह्मा जी के 1000 चतुर्युग बराबर दिन होता है और इतने ही चतुर्युग के बराबर रात होती है इस तरह ब्र्ह्मा जी दिन रूपी कल्प मे मनवन्तर बनाते, श्री विष्णु जी सभी का पालन करते है और शंकर जी सभी का संहार करते रहते है| कितने हीं कल्प आये और गये इसका तो व्याख्या करना अत्यन्त ही कठिन है यह सब सिर्फ़ शेष नाग रूपी भगवान विष्णु जी ही जानते है उनकी माया क़ी कोई अन्त ही नहीं है|

कल्प गणना ०4ब्रह्माण्ड की आयु वेदिक गणना के अनुसार

अभी जो वैवस्वत मनवन्तर चल रहा है इस वैवस्वत मनवन्तर के 71 चतुर्युग में 27 चतुर्युग बीत चुका है और 28वा चतुर्युग चल रहा है इस 28वा चतुर्युग में भी सत्य युग, त्रेता और द्वापर नाम की युग समाप्त हो चुका है अभी आखरी युग के कलयुग चल रहा है इसे भी समाप्त होने मे कुछ हीं समय बचा हैएक मनवन्तर के 71 चतुर्युग को देवताओं के गणना के अनुसार 12000 हजार दिव्य वर्ष कहते है इस एक मनवन्तर के 12000 दिव्य वर्ष में 4000 दिव्य वर्ष के सत्य युग होता है, 3000 दिव्य वर्ष के त्रेता होता है 2000 दिव्य वर्ष के द्वापर होता है और 1000 दिव्य वर्ष के कलियुग होता है, पितरों का संध्या और संध्यांश सत्य युग मे 800 वर्ष के होते है, त्रेता युग मे 600 वर्ष के संध्या और संध्यांश होते है द्वापर मे 400 वर्ष के संध्या और संध्यांश होते है और कलियुग मे 200 वर्ष के संध्या और संध्यांश होते है और मनुष्यों के गणना के अनुसार एक मनवन्तर की आयु 4320000 वर्ष होते है |

एक मन्वन्तर के 4320000 वर्ष में मनुष्यों के दिन-रात 1577917828 होते है | 1577917828 दिन में महीना, तिथिक्षय, आधी मास और चन्द्र मास निचे दिए हुए अंकों जितना होता है

रवि मासों की संख्या 51840000 है, तिथि क्षय 25082252 होते है, अधिमास 1593336 होते है और चान्द्र मास 53433336 होते है

कल्प गणना ०5ब्रह्माण्ड की आयु वेदिक गणना के अनुसार

मन्वन्तर के गणना करने की चार विधि है सूर्य के द्वारा, चन्द्र के द्वारा, ऋतू के द्वारा और नक्षत्र के द्वारा इसके अलावा 5वा विधि नहीं है इसी चार विधि के द्वारा मनुष्यों में गणना की जाती हैसूर्य के हिसाब से गणना करने पर मनुष्यों के 365 दिन का एक वर्ष होता है, चन्द्रमा के हिसाब से गणना करने पर मनुष्यों के 354 दिन का एक वर्ष होता है, ऋतू या सावन के हिसाब से गणना करने पर मनुष्यों के 360 दिन का एक वर्ष होता है, नक्षत्र के हिसाब से गणना करने पर मनुष्यों के 335 दिन का एक वर्ष होता है

इन्ही चार गणनाओं के द्वारा भारत वर्ष के पावन मनुष्य अपने कार्य को करने में करते है
1. सर्दी, गर्मी और वर्षा की गणना सूर्य के महीनो के द्वारा की जाती है
2. अग्निष्टोम कार्य जैसे यज्ञ, उत्सव और विवाह ये सावन के गणना द्वारा की जाती है
3. जीविका चलाने के कार्य समबन्धी की गणना माला-मास युक्त चन्द्रमा की गणना से की जाती है
4. ग्रहों की चाल का सही स्थिति जानने के लिए नक्षत्र के द्वारा गणना की जाती है

युगादि तिथियों का वर्णन
(1) वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को सतयुग का प्रारम्भ होता है (May 3 )
(2) कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के नवमी को त्रेता का प्रारम्भ होता है (November 9)
(3) भ्रादपद मास के कृषण पक्ष की त्रयोदशी को द्वापर का प्रारम्भ होता है ( August 3)
(4) माध मास की पूर्णिमा को कलयुग का प्रारम्भ होता है ( December 15)

ये चारों युगादि तिथी है इन तिथियों में क्रम से सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग इन चारों युगों का प्रारम्भ होता है
जिस समय चन्द्रमा, सूर्य और वृहस्पति एक ही समय एक ही साथ पुष्य नक्षत्र के प्रथम पल में प्रवेश करेंगे, एक राशी पर एक साथ आवेंगे उसी समय सतयुग का आरम्भ हो जाएगा

कल्प गणना ०6ब्रह्माण्ड की आयु वेदिक गणना के अनुसार

अब मनुष्यों के गणना विधी समझ लीजिये
(आँख के पलक को उठने और गिरने में जितना समय लगता है उसे निमेष कहते है)
1 निमेष
15 निमेष =1 काष्ठा
30 काष्ठा = 1 कला
30 कला = 1 क्षण
6 क्षण = 1 धडी
2 धडी = 1 मुहर्त
30 मुहर्त 1 दिन-रात (15 मुहर्त का दिन और 15 मुहर्त की रात होती है) (24 hrs)
30 दिन = 1 महीना1 महीना में 2 पक्ष होते है जिसमे 15 दिन का कृष्णपक्ष 15 दिन को शुक्लपक्ष होता है
यह दो पक्ष पितरों का संध्या और संध्यांश है, इसमे संध्या पितरो की दिन होता है और रात्री को संध्यांश कहते है यह सांध्या और संध्यांश पृथ्वी की उत्तरायण भाग Alaska में होता है, पूर्णिमा वाले जो 15 दिन के मनुष्य के लिए जो रात्री होती है वह पितरों के लिए 1 रात होता है, जो आमवाश्या वाली 15 दिन की जो काली रात होती है वह पितरों का 1 दिन होता है इस तरह मनुष्यों का जो एक महीना का समय होता है वह पितरों के लिए एक दिन होता हैएक मनवनतर में संध्या और संध्यांश इस तरह से होता है सतयुग में 400 वर्ष के सध्या और 400 वर्ष के संध्यांश होता है, त्रेता में 300 वर्ष के स्नाध्या और 300 वर्ष के संध्यांश होता है, द्वापर में 200 वर्ष के सध्या और 200 वर्ष के संध्यांश होता है और कलयुग में 100 वर्ष के सध्या और 100 वर्ष के संध्यांश होता है

संध्या और संध्यांश के बिच में जो मनुष्यों वाली दिन रात होती है उसे युग कहते है, जब चार चतुर्युग वाला काल एक चरण से दूसरे चरण की ओर जाता है तो यह संध्या और संध्यांश की इस तरह के स्थिती होती है युग के आरम्भ में संध्या के समय मनुष्य जैसा दिन रात होता है, जब युग का अंत होने लगता है तब संध्यांश के समय मनुष्यों जैसी दिन रात होते है यही इसका प्रमाण है यह स्थिती इस वर्त्तमान समय में पृथ्वी की उत्तरायण भाग के अलास्का नाम वाले जगह में डेड हॉर्स नाम के प्रांत में होते दिखाई देता है

कल्प गणना ०7ब्रह्माण्ड की आयु वेदिक गणना के अनुसार

2 महीना = 1 ऋतू
3 ऋतू = 1 अयन
2 अयन = 1 वर्ष (12 महीनो = 1 वर्ष)
1 वर्ष में 2 अयन होते है जिसको उत्तरायण और दक्षिणायन कहते है
6 महीना = 1 पहला अयन (उत्तरायण North Pole में होते है)
6 महीना = 1 दूसरा अयन (दक्षिणायन South Pole में होते है)उत्तरायण देवताओं का 1 दिन, दक्षिणायन देवताओं का 1 रात्री होते है यह दिन और रात इस वर्तमान समय में पृथ्वी के उत्तरायण में जिसका वर्त्तमान नाम नार्थ अटलांटिका और दक्षिणायन में जिसका वर्त्तमान नाम साउथ अटलांटिका है वहाँ होता है यह इसका प्रमाण हैएक मनवंतर के सत्य युग में 4000 हजार दिव्य वर्ष, त्रेता में 3000 हजार दिव्य वर्ष, द्वापर में 2000 दिव्य वर्ष और कलयुग में 1000 दिव्य वर्ष होते है

चारो युगों के वर्षों को जोरने पर 10000 हजार दिव्य वर्ष यह देवताओं के वर्ष होता है तथा 2000 दिव्य वर्ष जो बचता है वह पितरों का संध्या और संध्यांश वर्ष है (400+400+300+300+200+200+100+100 = 2000) इस तरह 12000 हजार दिव्य वर्ष देवताओं का एक मनवंतर कहलाता है
मनुष्यों का 1 वर्ष = 1 दिन देवताओं का
मनुष्यों का 360 वर्ष = 1 वर्ष देवताओ का (देवताओं के वर्ष को दिव्यवर्ष कहते है)

कल्प गणना ०8ब्रह्माण्ड की आयु वेदिक गणना के अनुसार

71 युगो का समलित मान जिसे महायुग भी कहते है इन सभी युगों के वर्षों को जोरने पर 4320000 वर्ष आता है क्योकी देवताओं के एक युग 12000 वर्ष के होते है वेद ने सावन के गणना के द्वारा समस्त चीजो के बारे में बताया है सावन के गणना के हिसाब से 360 दिन बराबर एक वर्ष मनुष्यों का होता है इसलिय 12000X360 = 4320000 वर्ष होते है4320000 वर्ष में 1577917828 दिन होते है अब इस दिन को सम्पूर्ण वर्ष से भाग कर दीजिय आपको 365.258.. दिन का एक वर्ष मिलेगा

1577917828/4320000 = 365.2587564 दिन = 1 वर्ष
365.2587564/12 = 30.4382297 दिन = 1 महीना
1577917828/30.4382297 = 51840000.0115644 एक मन्वन्तर का सम्पूर्ण महीना
51840000.0115644X30.4382297 = 1577917828 एक मन्वन्तर का सम्पूर्ण दिन

अब वर्तमान समय के जो गणना है उसके अनुसार समय निकाल लीजिय
वैदिक गणना में 30 मुहूर्त = 1 दिन रात होता है और वर्तमान समय में यह 24 धंटे का होता है इस लिय 30 को 24 से भाग दे दीजिय आपको 1 धंटे का समय प्राप्त होगा और इस 1 धंटे को 365 दिन के आये हुए समय के साथ गुना कर दीजिय आपको आज के वर्तमान समय के धंटा मिनट सकेंड मिली सकेंड मिल जाएगा
15 = 1 निमेष (0.0005926 min)
15 निमेष =1 काष्ठा (0.0088889 min)
30 काष्ठा = 1 कला (0.1333333 min)
30 कला = 1 क्षण (4 min)
6 क्षण = 1 धडी (24 min)
2 धडी = 1 मुहर्त (48 min)
30 मुहर्त 1 दिन-रात (1440 min)
365.2587564 यह सम्पूर्ण 1 वर्ष का समय है
इसमे 365 दिन है, 2 मुहर्त, 5 धड़ी, 8 क्षण, 7 कला, 5 काष्ठा, 6 निमेष, 4 बार आँख का पलक उठाना गिरना
24 hrs X 60 min = 1440 min (one day min)
2X48=96 min
5X24=120 min
8X4=32 min
7X
6X
4X
96+120+32=248 min / 60 min =4.1333333 (total day of year 365 day 4 hrs 13 min 33 sesond ….)

अगर मनुष्यों वाली दिन रात को सूर्य को प्रमाण मान कर गणना करते है तो 365 दिन 4 घंटे, 13 मिनट, 33 सेकेंड का समय आएगा परन्तु यदि आप मनुष्यों और पितर के दिन को आपस में जोर कर गणना करेंगे तो आपको 365 दिन, 6 घंटे 8 मिनट का समय आएगा
एक मनवन्तर में तिथिक्षय 25082252 दिन के होते है, तिथिक्षय को 4320000 वर्ष से भाग कर दीजिय, आपको एक वर्ष में होने वाले तिथिक्षय के दिन प्राप्त हो जाएंगे
25082252/4320000 = 5.806076851……..
इसमे तिथिक्षय 5 दिन है, 8 मुहर्त, 0 धड़ी, 6 क्षण, 0 कला, 7 काष्ठा, 6 निमेष, 8 बार आँख का पलक उठाना गिरना, इसके आगे भी गणना है किन्तु अत्यधिक होने के कारण इसको समलित नहीं किया गया है
8X48 = 384 min
6X4 = 24 min
384+24=408 min / 60 = 6.8

कल्प गणना ०9ब्रह्माण्ड की आयु वेदिक गणना के अनुसार

हे महामते मनुष्यों के सौर गणना के अनुसार एक वर्ष में 365 दिन 6 घंटा 8 मिनट का समय होता है, इसी तरह अब आप एक चतुर्युग में कितने दिन कौन सी युग के होते है वह समझ लीजिय.
एक मनवन्तर के सम्पूर्ण दिन को एक मनवन्तर के सम्पूर्ण चतुर्युग से भाग कर दीजिय आपको एक चतुर्युग का दिन प्राप्त हो जाएगा1577917828/71 = 22224194.760563380281…….
22224194 एक मनवन्तर के सम्पूर्ण एक चतुर्युग के दिन है
सत्ययुग + त्रेता + द्वापर + कलयुग = एक चतुर्युग
इस एक चतुर्युग के दिन को 3, 4, 6, 12 से भाग कर दीजिय
22224194/3 = 7408064.66666.. एक चतुर्युग में सत्य-युग के दिन
22224194/4 = 5556048.5 एक चतुर्युग में त्रेता-युग के दिन
22224194/6 = 3704032.333333…. एक चतुर्युग में द्वापर-युग के दिन
22224194/12 = 1852016.16666… एक चतुर्युग में कलयुग के दिन
7408064 + 5556048 + 3704032 + 1852016 = 18520161.665
22224194 – 18520161 = 3704033
इस 3704033 दिन को 2.5, 3.3333333, 5, 10 से भाग कर दीजिय
3704033/2.5 = 1481613.2 दिन
3704033/3.3333333 = 1111209.911112099 दिन
3704033/5 = 740806.6 दिन
3704033/10 = 370403.3 दिनहे महामते कलयुग में मनुष्यो वाली दिन-रात 1852016 है
कलयुग में पितरों वाले स्थान अलास्का नाम के शहर के डेड-हार्स नामक प्रांत में 370403 इतना दिन होता है
कलयुग के दिव्य दिन वाले स्थान पृथ्वी के उत्तरायण (North Pole) और दक्षिणायन (South Pole) में 5066 दिन होता है

एक महायुग में जो सूर्य महीना बताया गया है उसी तरह चन्द्र महीना का भी सम्पूर्ण जोड़ यह 53433336 है यह भी उसी तरह गणना करना चाहिए जैसे सूर्य महीना की गणना की गयी है। 25082252 यह जो तिथीक्षय जो है यह वह सम्पूर्ण दिन की सख्या है जो महीना में दिन कम और ज्य़ादा जो होता है उसी का सम्पूर्ण योग है

इसी तरह हिंदी महीना या कलेंडर में आधी मास का जो एक मनवन्तर में आते है यह उसका यह सम्पूर्ण योग 1593336 है

कल्प गणना 10ब्रह्माण्ड की आयु वेदिक गणना के अनुसार
“गणना करने की दूसरी विधि बतलाई जाती है”
12000 दिव्य वर्ष को 71 चतुर्युग के दिव्य वर्ष से भाग करे
12000/71=169.01408 एक चतुर्युग का दिव्य वर्ष
12000 दिव्य वर्ष को प्रत्येक चतुर्युग के दिव्य वर्ष से भाग करे इससे आपको सत्य-युग, त्रेता, द्वापर और कलयुग नाम वाले काल के अंक प्राप्त होगाएक मनवन्तर के 12000 दिव्य वर्ष में 4000 दिव्य वर्ष के सत्य-युग होता है, 3000 दिव्य वर्ष के त्रेता होता है, 2000 दिव्य वर्ष के द्वापर होता है और 1000 दिव्य वर्ष के कलयुग होता है इसके द्वारा प्रत्येक युग में होने वाले देवताओं और मनुष्यों के वर्ष कितने कितने होते है यह बताया जाता है
12000/4000 = 3 सत्ययुग
12000/3000 = 4 त्रेता
12000/2000 = 6 द्वापर
12000/1000 = 12 कलयुग
12000 दिव्य वर्ष को 71 चतुर्युग से भाग करने पर जो अंक प्राप्त हुआ है उसे 3, 4, 6, 12 से भाग कर दीजिय इससे आपको प्रत्येक चतुर्युग काल के दिव्य वर्ष प्राप्त हो जायेगा
169.01408/3 = 56.33802 दिव्य वर्ष सत्ययुग
169.01408/4 = 42.25352 दिव्य वर्ष त्रेता
169.01408/6 = 28.169013 दिव्य वर्ष द्वापर
169.01408/12 = 14.084507 दिव्य वर्ष कलयुग
3, 4, 6 और 12 से भाग करने पर जो अंक प्राप्त हुआ है उसे 360 से गुना कर दीजिये इसके द्वारा आपको प्रत्येक युग में मनुष्यों वाला कितने वर्ष का होता है वह प्राप्त हो जाएगा
56.338027 X 360 = 20281.69 (सत्य-युग)
42.25352 X 360 = 15211.267 (त्रेता -युग)
28.169013 X 360 = 10140.845 (द्वापर -युग)
14.084507 X 360 = 5070.4225 (कलयुग)
20281.69 वर्ष मनुष्यों के गणना विधि से सत्य-युग का समय होता है जो एक चतुर्युग के काल में होने वाले समय है
15211.267 वर्ष मनुष्यों के गणना विधि से त्रेता-युग का समय होता है जो एक चतुर्युग के काल में होने वाले समय है
10140.845 वर्ष मनुष्यों के गणना विधि से द्वापर-युग का समय होता है जो एक चतुर्युग के काल में होने वाले समय है
5070.4225 वर्ष मनुष्यों के गणना विधि से कलयुग का समय होता है जो एक चतुर्युग के काल में होने वाले समय है
अब चारों युग के वर्ष को आपस में जोड़ दीजिय आपको एक चतुर्युग का सम्पूर्ण वर्ष प्राप्त हो जाएगा
सत्ययुग + त्रेता + द्वापर + कलयुग = एक चतुर्युग
20281.69 + 15211.267 + 10140.845 + 5070.4225 = 50704.225
50704.225 एक चतुर्युग का सम्पूर्ण वर्ष है
एक मनवन्तर में कितने वर्ष का चारों काल होता है इसको जानने के लिय सभी काल के प्राप्त वर्ष को 71 से गुना कर दीजिये
20281.69 X 71 = 1439963 सत्ययुग (1440000)
15211.267 X 71 = 1080000 त्रेता
10140.845 X 71 = 720000 द्वापर
5070.4225 X 71 = 360000 कलयुग
दिव्य वर्ष जानने के लिए प्राप्त अंक में 360 से भाग कर दीजिय आपको ऊपर बताये गए सभी दिव्य वर्ष प्राप्त हो जाएंगे
1439963/360 = 3999.988 (4000) सत्ययुग
1080000/360 = 3000 त्रेता
720000/360 = 2000 द्वापर
360000/360 = 1000 कलयुग
1439963 + 1080000 + 720000 + 360000 = 3599963
3999.988 + 3000 + 2000 + 1000 = 9999.988 (10000 दिव्यवर्ष)
मनुष्यो वाले जो दिन रात होते है इस हिसाब से 3599963 वर्ष (3600000 वर्ष) एक मनवन्तर में होते है इसको 360 से भाग करे आपको 10000 दिव्य वर्ष मिल जाएगा
3599963/360 = 9999.8972222222 (10000 दिव्यवर्ष)
169.01408/3=56.338027X360=20281.69X71=1439963/360=3999.988 (4000) सत्ययुग
169.01408/4=42.25352X360=15211.267X71=1080000/360=3000 त्रेता
169.01408/6=28.169013X360=10140.845X71=720000/360=2000 द्वापर
169.01408/12=14.084507X360=5070.4225X71=360000/360=1000 कलयुग
इस समय कलयुग नाम वाला समय चल रहा है जिसकी आयु 5070 या 5071 वर्ष है जिसमे अब तक 5015 वर्ष समाप्त हो चुका है यह गणना इस समय अग्रेजी गणना के अनुसार 2013 वर्ष से यह सभी गणना की गयी है इस युग को समाप्त होने में मात्र कुछ और ही समय बच गया है जिसके बाद सतयुग आरम्भ हो जाएगा