सामवेद से हुआ है संगीत का उद्भव

YUVA SHAKTI BANARAS/ January 13, 2015/ Truth/

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संगीत का उद्भव सामवेद से हुआ है। अंग्रेजी का सिंग, सिंगर और सांग जैसे शब्द संगीत से ही निकले हैं। वीणा शब्द मूलतः संस्कृत का शब्द है, यही अंग्रेजी में बिआनो और बाद में पियानो के रूप में प्रचलित हुआ।
हारमोनियम का हार्मोनी शब्द संस्कृत का सारेमोनी है। इसी प्रकार कुछ और शब्द देखें:
Violin जीव-लीन
Sitar सप्ततार
Guitar गीत-सार
Drum डमरू
Poet भाट
आर्यों का संगीतशास्त्रा बहुत उन्नति का था। संगीत में गान, वाद्य और नृत्य का समावेश होता था। सामवेद का एक भाग गान है, जो सामगान के नाम से प्रसिद्ध है। देवगिरि के यादव राजा सिंघण के दरबार के गायनाचार्य सांगदेव ने अपनी रचना संगीत रत्नाकर में प्राचीन संगीत के विद्वानों की सूची में सदाशिव, शिव, ब्रह्मा, भरत, कश्यम, मतंग, याष्टिक, दुर्गा, शक्ति, नारद, तुम्बुरू विशाखिल, रम्भा, रावण, क्षेत्रापाल आदि का उल्लेख किया है। सोंग संगीत का अपभं्र्रश है। सभी वर्ण, संयुक्ताक्षर, मात्रा आदि के उच्चारण का मूल ‘स्वर’ हैं। स्वर तीन प्रकार के हैं:
उदात्त-उच्च स्वर
अनुदात्त-नीचे का स्वर
स्वरित- मध्यम स्वर
इनका और सूक्ष्म विश्लेषण किया गया, जो संगीत शास्त्रा का आधार बना। संगीत शास्त्रा में सात स्वर माने गए जिन्हें सा रे ग म प ध नि के प्रतीक चिन्हों से जाना जाता है। इन सात स्वरों का मूल तीन स्वरों में विभाजन किया गया।
उच्चौर्निषाद, गांधारौ नीचौ ऋर्षभधैवतौ।
शेषास्तु स्वरिता ज्ञेयारू, षड्ज मध्यमपंचमाः
अर्थात् निषाद तथा गांधार (नि ग) स्वर उदात्त हैं। ऋषभ और धैवत (रे, ध) अनुदात्त। षड्ज, मध्यम और पंचम (सा, म, प) ये स्वरित हैं।
इन सातों स्वरों के विभिन्न प्रकार के समायोजन से विभिन्न रागों के रूप बने और उन रागों के गायन में उत्पन्न विभिन्न ध्वनि तरंगों का परिणाम मानव, पशु प्रकृति सब पर पड़ता है। इसका भी बहुत सूक्ष्म निरीक्षण हमारे यहाँ किया गया है। विशिष्ट मंत्रों के विशिष्ट ढंग से उच्चारण से वायुमण्डल में विशेष प्रकार के कंपन उत्पन्न होते हैं, जिनका विशेष परिणाम होता है। यह मंत्राविज्ञान का आधार है। इसकी अनुभूति वेद मंत्रों के श्रवण या मंदिर के गुंबज के नीचे मंत्रापाठ के समय अनुभव में आती है।
हमारे यहां विभिन्न रागों के गायन व परिणाम के अनेक उल्लेख प्राचीनकाल से मिलते हैं। सुबह, शाम, हर्ष, शोक, उत्साह, करुणा-भिन्न-भिन्न प्रसंगों के भिन्न-भिन्न राग हैं। दीपक से दीपक जलना और मेघ मल्हार से वर्षा होना आदि उल्लेख मिलते हैं। वर्तमान में भी कुछ उदाहरण मिलते हैं।
प्रसिद्ध संगीतज्ञ पं. ओंकार नाथ ठाकुर 1933 में फ्लोरेन्स (इटली) में आयोजित अखिल विश्व संगीत सम्मेलन में भाग लेने गए। उस समय मुसोलिनी वहां का तानाशाह था। उस प्रवास में मुसोलिनी से मुलाकात के समय पंडित जी ने भारतीय रागों के महत्व के बारे में बताया। इस पर मुसोलिनी ने कहा, ‘मुझे कुछ दिनों से नींद नहीं आ रही है। यदि आपके संगीत में कुछ विशेषता हो, तो बताइए।’
इस पर पं. ओंकार नाथ ठाकुर ने तानपूरा लिया और राग ‘पूरिया’ (कोमल धैवत का) गाने लगे। कुछ समय के अंदर मुसोलिनी को प्रगाढ़ निद्रा आ गई। बाद में उसने भारतीय संगीत की भूरि-भूरि प्रशंसा की तथा रॉयल एकेडमी ऑफ म्यूजिक के प्राचार्य को पंडित जी के संगीत के स्वर एवं लिपि को रिकार्ड करने का आदेश दिया।
पांडिचेरी स्थित श्री अरविंद आश्रम में श्रीमां ने एक प्रयोग किया। एक मैदान में दो स्थानों पर एक ही प्रकार के बीज बोये गए तथा उनमें से एक के आगे पॉप म्यूजिक बजाया गया तथा दूसरे के आगे भारतीय संगीत। समय के साथ अंकुर फूटा और पौधा बढ़ने लगा। परन्तु आश्चर्य यह था कि जहां पॉप म्यूजिक बजता था, वह पौधा असंतुलित तथा उसके पत्ते कटे-फटे थे। जहां भारतीय संगीत बजता था, वह पौधा संतुलित तथा उसके पत्ते पूर्ण आकार के और विकसित थे। यह देखकर श्रीमां ने कहा, ‘दोनों संगीतों का प्रभाव मानव के आन्तरिक व्यक्तित्व पर भी उसी प्रकार पड़ता है जिस प्रकार इन पौधों पर पड़ा दिखाई देता है।’
किसी घंटी पर प्रहार करते हैं, तो उसकी ध्वनि देर तक सुनाई देती है। इसकी प्रक्रिया क्या है? इसकी व्याख्या में वात्स्यायन तथा उद्योतकर कहते हैं कि आघात में कुछ ध्वनि परमाणु अपनी जगह छोड़कर और संस्कार जिसे कम्प संतान-संस्कार कहते हैं, से एक प्रकार का कम्पन पैदा होता है और वायु के सहारे वह आगे बढ़ता है तथा मन्द तथा मन्दतर इस रूप में अविच्छिन्न रूप से सुनाई देता है। इसकी उत्पत्ति का कारण स्पन्दन है।
विज्ञान भिक्षु अपने प्रवचन भाष्य अध्याय 1 सूत्रा 7 में कहते हैं कि प्रतिध्वनि क्या है? इसकी व्याख्या में कहा गया कि जैसे पानी या दर्पण में चित्रा दिखता है, वह प्रतिबिम्ब है। इसी प्रकार ध्वनि टकराकर पुनः सुनाई देती है, वह प्रतिध्वनि है। जैसे जल या दर्पण का बिम्ब वास्तविक चित्रा नहीं है, उसी प्रकार प्रतिध्वनि भी वास्तविक ध्वनि नहीं है।
वाचस्पति, जैमिनी, उदयन आदि आचार्यों ने बहुत विस्तारपूर्वक अपने ग्रंथों में ध्वनि की उत्पत्ति, कम्पन, प्रतिध्वनि, उसकी तीव्रता, मन्दता, उनके परिणाम आदि का हजारों वर्ष पूर्व किया जो विश्लेषण है, वह आज भी चमत्कृत करता है।